Thursday, 26 October 2017

वट सावित्री व्रत कथा ..

मद्र देश के राजा अश्वपति ने पत्नि सहित सन्तान के लिये सावित्री देवी का विधि पूर्वक व्रत तथा पूजन करके पुत्री होने पर वर प्राप्त किया । सर्वगुण देवी सावित्री ने पुत्री के रूप में अश्वपति के घर कन्या के रूप मे जन्म लिया । कन्या के युवा होने पर अश्वपति ने अपने मंत्री के साथ सावित्री को अपना पति चुनने के लिए भेज दिया सावित्री अपने मन के अनुकूल वर का चयन कर जब लौटी तो उसे उसी दिन देवर्षि नारद उनके यहाँ पधारे नारदजी ने पूछने पर सावित्री ने कहा,"महाराज द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें मैंने पति रूप में वरण कर लिया है"।

नारदजी ने सत्यवान तथा सावित्री के ग्रहो की गणना कर अश्वति को बधाई दी तथा सत्यवान के गुणो की भूरि-भूरि प्रशंसा की और बताया कि सावित्री के बारह वर्ष की आयु होने पर सत्यवान कि मृत्यु हो जायेगी । नारदजी की बात सुनकर राजा अश्वपति का चेहरा मुर्झा गया उन्होने सावित्री से किसी अन्य को अपना पति चुनने की सलाह दी परन्तु सावित्री ने उतर दिया,"आर्य कन्या होने के नाते जब मै सत्यवान का वरण कर चुकी हूँ तो अब वे चाहे अल्पायु हों या दिर्घायु, मैं किसी अन्य को अपने ह्वदय मे स्थान नही दे सकती।" सावित्री ने नारदजी से सत्यवान की मृत्यु का समय ज्ञातकर लिया दोनो को विवाह हो गया ।

सावित्री अपने श्वसुर परिवार के साथ जंगल मे रहने लगी । नादरजी द्वारा बताय हुये दिन से तीन दिन पूर्व से ही सावित्री ने उपवास शुरू कर दिया। नारद द्वारा निश्चित तिथि को जब सत्यवान लकडी काटने के लिये चला तो सास-श्वसुर से आज्ञा लेकर वह भी सत्यवान के साथ चल दी । सत्यवान वन में पहुँचकर लकडी काटने के लिए चढा । वृक्ष पर चढने के बाद उसके सिर में भंयकर पीडा होने लगी। वह नीचे उतरा। सावित्री ने उसे बड के पेड के नीचे लिटा कर उसका सिर अपनी जाँघ पर रख लिया ।

देखते ही देखते यमराज ने ब्र्रह्या के विधान के रूप रेखा सावित्री के सामने स्पष्ट की और सत्यवान के प्राणो को लेकर चल दिये (कही-कही ऐसा भी उल्लेख मिलता हैं कि वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डस लिया था) सावित्री सत्यावान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे पीछे चल दी । पीछे आती हुई सावित्री को यमराज ने उसे लौट जाने का आदेश दिया । इस पर वह बोली महराज जहा पति वही पत्नि । यही धर्म है, यही मर्यादा है ।

सावित्री के धर्म निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज बोले पति के प्राणो से अतिरिक्त कुछ भी माँग लो । सावित्री ने यमराज से सास-श्वसुर के आँखो ज्योती और दीर्घायु माँगी । यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ गए सावित्री भी यमराज का पीछा करते हुये रही । यमराज ने अपने पीछे आती सावित्री से वापिस लौटे जाने को कहा तो सावित्री बोली पति के बिना नारी के जीवन के कोई सार्थकता नही । यमराज ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान माँगने के लिये कहा इस बार उसने अपने श्वसुर का राज्य वापिस दिलाने की प्रार्थना की । तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिए सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही इस बार सावित्री ने सौ पुत्रो का वरदान दिया है, पर पति के बिना मैं पुत्रो का वरदान दिया है पर पति के बिना मैं माँ किस प्रकार बन सकती हूँ, अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए।

सावित्री की धर्मनिष्ठा,ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणो को अपने पाश से स्वतंत्र कर दिया । सावित्री सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुँची जहाँ सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुँची जहाँ सत्यवान का मृत शरीर रखा था । सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा । प्रसन्नचित सावित्री अपने सास-श्वसुर के पास पहुँची तो उन्हे नेत्र ज्योती प्राप्त हो गई इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हे मिल गया आगे चलकर सावित्री सौ पुत्रो की माता बनी । इस प्रकार चारो दिशाएँ सावित्री के पतिव्रत धर्म के पालन की किर्ति से गूँज उठी ।

श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा |

प्राचीन समय में राजा सुरथ नाम के राजा थे, राजा प्रजा की रक्षा में उदासीन रहने लगे थे, परिणाम स्वरूप पडौसी राजा ने उस पर चढाई कर दी, सुरथ की सेना भी शत्रु से मिल गयी थी, परिणामस्वरूप राजा सुरथ की हार हुयी, और वह जान बचाकर जंगल की तरफ़ भागा।

उसी वन में समाधि नामका एक बनिया अपनी स्त्री एवं संतान के दुर्व्यवहार के कारण निवास करता था, उसी वन में बनिया समाधि और राजा सुरथ की भेंट हुई, दोनो का परस्पर परिचय हुआ, वे दोनो घूमते हुये, महर्षि मेघा के आश्रम में पहुंचे, महर्षि मेघा ने उन दोनो के आने का कारण पूंछा, तो वे दोनो बोले के हम अपने सगे सम्बन्धियों द्वारा अपमानित एवं तिरस्कृत होने पर भी हमारे ह्रदय में उनका मोह बना हुआ है, इसका कारण क्या है?

महर्षि मेघा ने उन्हे समझाया कि मन शक्ति के आधीन होता है, और आदि शक्ति के अविद्या और विद्या दो रूप है, विद्या ज्ञान स्वरूप है, और अविद्या अज्ञान स्वरूप, जो व्यक्ति अविद्या (अज्ञान) के आदिकरण रूप में उपासना करते है, उन्हे वे विद्या स्वरूपा प्राप्त होकर मोक्ष प्रदान करती हैं।

इतना सुन राजा सुरथ ने प्रश्न किया- हे महर्षि ! देवी कौन है? उसका जन्म कैसे हुआ? महर्षि बोले- आप जिस देवी के विषय में पूंछ रहे है, वह नित्य स्वरूपा और विश्वव्यापिनी है, उसके बारे में ध्यानपूर्वक सुनो, कल्पांत के समय विष्णु भगवान क्षीर सागर में अनन्त शैया पर शयन कर रहे थे, तब उनके दोनो कानों से मधु और कैटभ नामक दो दैत्य उत्पन्न हुये, वे दोनों विष्णु की नाभि कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी को मारने दौडे, ब्रह्माजी ने उन दोनो राक्षसों को देखकर विष्णुजी की शरण में जाने की सोची, परन्तु विष्णु भगवान उस समय सो रहे थे, तब उन्होने भगवान विष्णु को जगाने हेतु उनके नयनों में निवास करने वाली योगनिद्रा की स्तुति की।

परिणामस्वरूप तमोगुण अधिष्ठात्री देवी विष्णु भगवान के नेत्र नासिका मुख तथा ह्रदय से निकलकर ब्रह्माजी के सामने उपस्थित हो गयी, योगनिद्रा के निकलते ही विष्णु भगवान उठकर बैठ गये, भगवान विष्णु और उन राक्षसों में पांच हजार साल तक युद्ध चलता रहा, अन्त में मधु और कैटभ दोनो राक्षस मारे गये।

ऋषि बोले- अब ब्रह्माजी की स्तुति से उत्पन्न महामाया देवी की वीरता तथा प्रभाव का वर्णन करता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो।

एक समय देवताओं के स्वामी इन्द्र तथा दैत्यों के स्वामी महिषासुर में सैकडों वर्षों तक घनघोर संग्राम हुआ, इस युद्ध में देवराज इन्द्र की पराजय हुई, और महिषासुर इन्द्रलोक का स्वामी बन बैठा।

अब देवतागण ब्रहमा के नेतृत्व में भगवान विष्णु और भगवान शंकर की शरण में गये।

देवताओं की बातें सुनकर भगवान विष्णु तथा भगवान शंकर क्रोधित हुये, भगवान विष्णु के मुख तथा ब्रह्माजी और शिवजी तथा इन्द्र आदि के शरीर से एक तेज पुंज निकला, जिससे समस्त दिशायें जलने लगीं, और अन्त में यही तेजपुंज एक देवी के रूप में परिवर्तित हो गया।

देवी ने सभी देवताओं से आयुध एवं शक्ति प्राप्त करके उच्च स्वर में अट्टहास किया जिससे तीनों लोकों में हलचल मच गयी।

महिषासुर अपनी सेना लेकर इस सिंहनाद की ओर दौडा, उसने देखा कि देवी के प्रभाव से तीनों लोक आलोकित हो रहे है।

महिषासुर की देवी के सामने एक भी चाल सफ़ल नही हुयी, और वह देवी के हाथों मारा गया, आगे चलकर यही देवी शुम्भ और निशुम्भ राक्षसों का बध करने के लिये गौरी देवी के रूप में अवतरित हुयी।

इन उपरोक्त व्याख्यानों को सुनाकर मेघा ऋषि ने राजा सुरथ तथा बनिया से देवी स्तवन की विधिवत व्याख्या की।

राजा और वणिक नदी पर जाकर देवी की तपस्या करने लगे, तीन वर्ष तक घोर तपस्या करने के बाद देवी ने प्रकट होकर उन्हे आशीर्वाद दिया, इससे वणिक संसार के मोह से मुक्त होकर आत्मचिंतन में लग गया, और राजा सुरथ ने शत्रुओं पर आक्रमण करके विजय प्राप्त करके अपना वैभव प्राप्त कर लिया।

मकरध्वज katha

पवनपुत्र हनुमान बाल-ब्रह्मचारी थे। लेकिन मकरध्वज को उनका पुत्र कहा जाता है। यह कथा उसी मकरध्वज की है।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार, लंका जलाते समय आग की तपिश के कारण हनुमानजी को बहुत पसीना आ रहा था। इसलिए लंका दहन के बाद जब उन्होंने अपनी पूँछ में लगी आग को बुझाने के लिए समुद्र में छलाँग लगाई तो उनके शरीर से पसीने के एक बड़ी-सी बूँद समुद्र में गिर पड़ी। उस समय एक बड़ी मछली ने भोजन समझ वह बूँद निगल ली। उसके उदर में जाकर वह बूँद एक शरीर में बदल गई।

एक दिन पाताल के असुरराज अहिरावण के सेवकों ने उस मछली को पकड़ लिया। जब वे उसका पेट चीर रहे थे तो उसमें से वानर की आकृति का एक मनुष्य निकला। वे उसे अहिरावण के पास ले गए। अहिरावण ने उसे पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया। यही वानर हनुमान पुत्र ‘मकरध्वज’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

जब राम-रावण युद्ध हो रहा था, तब रावण की आज्ञानुसार अहिरावण राम-लक्ष्मण का अपहरण कर उन्हें पाताल पुरी ले गया। उनके अपहरण से वानर सेना भयभीत व शोकाकुल हो गयी। लेकिन विभीषण ने यह भेद हनुमान के समक्ष प्रकट कर दिया। तब राम-लक्ष्मण की सहायता के लिए हनुमानजी पाताल पुरी पहुँचे।

जब उन्होंने पाताल के द्वार पर एक वानर को देखा तो वे आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने मकरध्वज से उसका परिचय पूछा। मकरध्वज अपना परिचय देते हुआ बोला-“मैं हनुमान पुत्र मकरध्वज हूं और पातालपुरी का द्वारपाल हूँ।”

मकरध्वज की बात सुनकर हनुमान क्रोधित होकर बोले- “यह तुम क्या कह रहे हो? दुष्ट! मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ। फिर भला तुम मेरे पुत्र कैसे हो सकते हो?” हनुमान का परिचय पाते ही मकरध्वज उनके चरणों में गिर गया और उन्हें प्रणाम कर अपनी उत्पत्ति की कथा सुनाई। हनुमानजी ने भी मान लिया कि वह उनका ही पुत्र है।

लेकिन यह कहकर कि वे अभी अपने श्रीराम और लक्ष्मण को लेने आए हैं, जैसे ही द्वार की ओर बढ़े वैसे ही मकरध्वज उनका मार्ग रोकते हुए बोला- “पिताश्री! यह सत्य है कि मैं आपका पुत्र हूँ लेकिन अभी मैं अपने स्वामी की सेवा में हूँ। इसलिए आप अन्दर नहीं जा सकते।”

हनुमान ने मकरध्वज को अनेक प्रकार से समझाने का प्रयास किया, किंतु वह द्वार से नहीं हटा। तब दोनों में घोर य़ुद्ध शुरु हो गया। देखते-ही-देखते हनुमानजी उसे अपनी पूँछ में बाँधकर पाताल में प्रवेश कर गए। हनुमान सीधे देवी मंदिर में पहुँचे जहाँ अहिरावण राम-लक्ष्मण की बलि देने वाला था। हनुमानजी को देखकर चामुंडा देवी पाताल लोक से प्रस्थान कर गईं। तब हनुमानजी देवी-रूप धारण करके वहाँ स्थापित हो गए।

कुछ देर के बाद अहिरावण वहाँ आया और पूजा अर्चना करके जैसे ही उसने राम-लक्ष्मण की बलि देने के लिए तलवार उठाई, वैसे ही भयंकर गर्जन करते हुए हनुमानजी प्रकट हो गए और उसी तलवार से अहिरावण का वध कर दिया।

उन्होंने राम-लक्ष्मण को बंधन मुक्त किया। तब श्रीराम ने पूछा-“हनुमान! तुम्हारी पूँछ में यह कौन बँधा है? बिल्कुल तुम्हारे समान ही लग रहा है। इसे खोल दो।” हनुमान ने मकरध्वज का परिचय देकर उसे बंधन मुक्त कर दिया। मकरध्वज ने श्रीराम के समक्ष सिर झुका लिया। तब श्रीराम ने मकरध्वज का राज्याभिषेक कर उसे पाताल का राजा घोषित कर दिया और कहा कि भविष्य में वह अपने पिता के समान दूसरों की सेवा करे।

यह सुनकर मकरध्वज ने तीनों को प्रणाम किया। तीनों उसे आशीर्वाद देकर वहाँ से प्रस्थान कर गए। इस प्रकार मकरध्वज हनुमान पुत्र कहलाए।

सोमवार व्रतकथा

हिन्दू धर्म के अनुसार सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा की जाती है। जो व्यक्ति सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा करते हैं उन्हें मनोवांछित फल अवश्य मिलता है।

किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी जिस वजह से वह बेहद दुखी था। पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिवालय में जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था। उसकी भक्ति देखकर मां पार्वती प्रसन्न हो गई और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का निवेदन किया। पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि "हे पार्वती। इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है।" लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई। माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी।

माता पार्वती और भगवान शिव की इस बातचीत को साहूकार सुन रहा था। उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही गम। वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा। कुछ समय उपरांत साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया।

साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में यज्ञ कराओ। जहां भी यज्ञ कराओ वहीं पर ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना।

दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी की ओर चल पड़े। राते में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था। लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था। राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए एक चाल सोची। साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा।

लड़के को दूल्हे का वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया गया। लेकिन साहूकार का पुत्र एक ईमानदार शख्स था। उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी। उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि "तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है। मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं।"

जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई। राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया जिससे बारात वापस चली गई। दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया। जिस दिन लड़के की आयु 12 साल की हुई उसी दिन यज्ञ रखा गया। लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मामा ने कहा कि तुम अन्दर जाकर सो जाओ।

शिवजी के वरदानुसार कुछ ही क्षणों में उस बालक के प्राण निकल गए। मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप शुरू किया। संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे। पार्वती ने भगवान से कहा- प्राणनाथ, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा। आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें| जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया। अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है। लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे। माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया| शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया। शिक्षा समाप्त करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिए। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था। उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया। उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी आवभगत की और अपनी पुत्री को विदा किया।

इधर भूखे-प्यासे रहकर साहूकार और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है।

जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

। मंगलवार व्रत कथा

सर्वसुख, राजसम्मान तथा पुत्र-प्राप्ति के लिए मंगलवार व्रत रखना शुभ माना जाता है। मंगलवार व्रत कथा: एक समय की बात है एक ब्राह्मण दंपत्ति की कोई संतान नहीं थी जिस कारण वह बेहद दुखी थे।

एक समय ब्राह्मण वन में हनुमान जी की पूजा के लिए गया। वहां उसने पूजा के साथ महावीर जी से एक पुत्र की कामना की। घर पर उसकी स्त्री भी पुत्र की प्राप्ति के लिए मंगलवार का व्रत करती थी। वह मंगलवार के दिन व्रत के अंत में हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करती थी। एक बार व्रत के दिन ब्राह्मणी ना भोजन बना पाई और ना ही हनुमान जी को भोग लगा सकी। उसने प्रण किया कि वह अगले मंगलवार को हनुमान जी को भोग लगाकर ही भोजन करेगी। वह भूखी प्यासी छह दिन तक पड़ी रही। मंगलवार के दिन वह बेहोश हो गई। हनुमान जी उसकी निष्ठा और लगन को देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप ब्राह्मणी को एक पुत्र दिया और कहा कि यह तुम्हारी बहुत सेवा करेगा। बालक को पाकर ब्राह्मणी अति प्रसन्न हुई। उसने बालक का नाम मंगल रखा। कुछ समय उपरांत जब ब्राह्मण घर आया, तो बालक को देख पूछा कि वह कौन है? पत्नी बोली कि मंगलवार व्रत से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने उसे यह बालक दिया है। ब्राह्मण को अपनी पत्नी की बात पर विश्वास नहीं हुआ। एक दिन मौका देख ब्राह्मण ने बालक को कुएं में गिरा दिया। घर पर लौटने पर ब्राह्मणी ने पूछा कि "मंगल कहां है?" तभी पीछे से मंगल मुस्कुरा कर आ गया। उसे वापस देखकर ब्राह्मण आश्चर्यचकित रह गया। रात को हनुमानजी ने उसे सपने में दर्शन दिए और बताया कि यह पुत्र उसे उन्होंने ही दिया है। ब्राह्मण सत्य जानकर बहुत खुश हुआ। इसके बाद ब्राह्मण दंपत्ति मंगलवार व्रत रखने लगे। मंगलवार का व्रत रखने वाले मनुष्य हनुमान जी की कृपा व दया का पात्र बनते हैं।

| वामन अवतार कथा |

वामन अवतार भगवान विष्णु का पाचवा अवतार है । भगवान की लीला अनंत है और उसी में से एक वामन अवतार है । इसके विषय में श्रीमद्भगवदपुराण में एक कथा है । वामन अवतार कथानुसार देव और दैत्योंके युद्ध में दैत्य पराजित होने लगते हैं । पराजित दैत्य मृत एवं आहतों को लेकर अस्ताचल चले जाते हैं और दूसरी ओर दैत्यराज बलि इंद्र के वज्र से मृत हो जाते हैं तब दैत्यगुरु शुक्राचार्य अपनी मृत संजीवनी विद्या से बलि और दूसरे दैत्य को भी जीवित एवं स्वस्थ कर देते हैं । राजा बलि के लिए शुक्राचार्यजी एक यज्ञ का आयोजन करते हैं तथ अग्नि से दिव्य रथ, बाण, अभेद्य कवच पाते हैं इससे असुरों की शक्ति में वृद्धि हो जाती है और असुर सेना अमरावती पर आक्रमण करने लगती है ।

इंद्र को राजा बलि की इच्छा का ज्ञान होता है कि राजा बलि इस सौ यज्ञ पूरे करने के बाद स्वर्ग को प्राप्त करने में सक्षम हो जाएंगे, तब इंद्र भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं । भगवान विष्णु उनकी सहायता करने का आश्वासन देते हैं और भगवान विष्णु वामन रुप में माता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होने का वचन देते हैं । दैत्यराज बलि द्वारा देवों के पराभव के बाद कश्यपजी के कहने से माता अदिति पयोव्रत का अनुष्ठान करती हैं जो पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता है । तब भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन माता अदिति के गर्भ से प्रकट हो अवतार लेते हैं तथा ब्रह्मचारी ब्राह्मण का रूप धारण करते हैं ।

महर्षि कश्यप ऋषियों के साथ उनका उपनयन संस्कार करते हैं वामन बटुक को महर्षि पुलह ने यज्ञोपवीत, अगस्त्य ने मृगचर्म, मरीचि ने पलाश दण्ड, आंगिरस ने वस्त्र, सूर्य ने छत्र, भृगु ने खड़ाऊं, गुरु देव जनेऊ तथा कमण्डलु, अदिति ने कोपीन, सरस्वती ने रुद्राक्ष माला तथा कुबेर ने भिक्षा पात्र प्रदान किए । तत्पश्चात भगवान वामन पिता से आज्ञा लेकर बलि के पास जाते हैं । उस समय राजा बलि नर्मदा के उत्तर-तट पर अंतिम यज्ञ कर रहे होते हैं ।

वामन अवतारी श्रीहरि, राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच जाते हैं । ब्राह्मण बने श्रीविष्णु भिक्षा में तीन पग भूमि मांगते हैं । राजा बलि दैत्यगुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी अपने वचन पर अडिग रहते हुए, श्रीविष्णु को तीन पग भूमि दान में देने का वचन कर देते हैं । वामन रुप में भगवान एक पग में स्वर्गादि उर्ध्व लोकों को ओर दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लेते हैं । अब तीसरा पीजी रखने को कोई स्थान नहीं रह जाता है । बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया । ऎसे मे राजा बलि यदि अपना वचन नहीं निभाए तो अधर्म होगा । इसिलिए बलि अपना सिर भगवान के आगे कर देता है और कहता है तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए । वामन भगवान ने ठीक वैसा ही करते हैं और बलि को पटल लोक में रहने का आदेश करते हैं । बलि सहर्ष भवदाज्ञा को शिरोधार्य करता है ।

बलि के द्वारा वचनपालन करने पर, भगवान श्रीविष्णु अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और दैत्यराज बलि को वर् मांगने को कहते हैं । इसके बदले में बलि रात-दिन भगवान को अपने सामने रहने का वचन मांग लेता है, श्रीविष्णु को अपना वचन का पालन करते हुए, पातललोक में राजा बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार करते हैं ।

G K IN HINDI

*धातु तथा अधातु *
Q. जल पर तैरने वाली धातु कौन सी है ?⇨ सोडियम

Q. प्रकृति में मुक्त अवस्था में कौन सी धातु पायी जाती है ?⇨ चाँदी

Q. कौन सी धातु ठोस अवस्था में नहीं पायी जाती है ?⇨ पारा

Q. एंटीमनी क्या है ?⇨ उपधातु

Q. कौन सी धातु बिजली की अच्छी सुचालक होती है ?⇨ चाँदी

Q. फोटोग्राफी में कौन सा उपयोगी तत्व प्रयुक्त होता है ?⇨ सिल्वर ब्रोमाइट

Q. नीला थोथा का रासायनिक नाम क्या है ?⇨ कॉपर सल्फेट
Q. सबसे कठोर धातु कौन सी है ?⇨ प्लेटिनम

Q. सफेद स्वर्ण किसे कहा जाता है ?⇨ प्लेटिनम
Q. विद्युत बल्व का तन्तु किसका बना होता है ?⇨ टंगस्टन का

Q. कौन सी धातु अचालक की भांति ट्राजिस्टर के रूप में प्रयुक्त होती है ?⇨ जर्मेनियम

Q. किन तत्वों के लवणों द्वारा आतिशबाजी के रंग प्राप्त होते हैं ?⇨ Sr व Ba

Q. किस रेडियोधर्मी तत्व के भारत में विशाल भडार है ?⇨ थोरियम

Q. कलपक्कम के फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर में कौन सा तत्व ईधन के रूप में प्रयुक्त होता है ?⇨ समृद्ध यूरेनियम

Q. भारी जल क्या है ?⇨ मंदक
Q. सामान्य किस्म का कोयला कौन सा है ?⇨ बिटुमिनम
Q. हैलोजन से सबसे अधिक अभिक्रिया कौन करता है ?⇨ क्लोरीन
Q. प्रकृति में सबसे कठोर पदार्थ कौन सा है ?⇨ हीरा
Q. कार्बन के दो अपरूप कौन से है ?⇨ हीरा और ग्रेफाइट
Q. हीमोग्लोबिन में उपस्थित धातु कौन सी है ?⇨ लोहा
Q. संचायक बैटरियों में कौन सी धातु का प्रयोग करते हैं ?⇨ सीसा
Q वायुयान के निर्माण में कौन सी धातु उपयुक्त होती है ?⇨ प्लेटिनम का
Q. ‘एडम उत्प्रेरक’ किस धातु का नाम है ?⇨ प्लेटिनम का
Q. स्टील में कार्बन का प्रतिशत कितना होता है ?⇨ 0.1 से 1.5%
Q. एल्युमीनियम का मुख्य अयस्क क्या है ?⇨ बॉक्साइट
Q. मायोग्लोबिन कौन सी धातु होती है ?⇨ लोहा
Q. समुद्र में सबसे अधिक मात्रा में कौन सी धातु पाई जाती है ?⇨ सोडियम
Q. कौन सी धातु जल के साथ अभिक्रिया करके ऑक्सीजन गैस पैदा करती है ?⇨ कैडमियम
Q. धातु की प्रकृति कैसी होती है ?⇨ विद्युत धनात्मक
Q. पीतल में कौन सी धातुएँ होती है ?⇨ ताँबा व जस्ता...
[06/10 2:27 pm] Dr.deepak: *📚General Knowledge📚*

1⃣भारतीय रेल नेटवर्क का एशिया में कौनसा स्थान है?
*- दूसरा*

2⃣भारतीय रेलवे बोर्ड की स्थापना कब की गई थी?
*- 1905*

3⃣मनुष्य ने सबसे पहले किस जंतु को पालतू बनाया?
*- कुत्ता*

4⃣विश्व में प्रथम रेल कब चली?
*- 1825 ई. - इंग्लैंड*

5⃣भारतीय रेल बजट को सामान्य बजट से कब अलग किया गया?
*- 1924 ई.*

6⃣भारत में सबसे लंबी दूरी तय करने वाली रेलगाड़ी कौनसी है?
*- विवेक एक्सप्रेस*

7⃣भारत में प्रथम विद्युत इंजन का निर्माण कब प्रारंभ हुआ?
*- 1971 ई.*

8⃣इंटीग्रल कोच फैक्टरी कहाँ है?
*- पैरंबूर (चेन्नई)*

9⃣ब्रिटिश संसद ने भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम कब पारित किया था?
*- जुलाई 1947*

🔟रेलवे कोच फैक्टरी की स्थापना कब हुई?
*- 1988 ई.*

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1⃣भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली रेलगाड़ी कौनसी है?
*- समझौता व थार एक्सप्रेस*

2⃣भारत में सबसे तेजगति से चलने वाली रेलगाड़ी कौनसी है?
*- गतिमान एक्सप्रेस*

3⃣अंतरिक्ष यात्री को बाह्य आकाश कैसा दिखाई देता है?
*- काला*

4⃣संसद का संयुक्त अधिवेशन कौन बुलाता है?
*- राष्ट्रपति*

5⃣भारत के किस राज्य में राष्ट्रीय राजमार्ग सबसे अधिक है?
*- उत्तर प्रदेश*

6⃣भारत राष्ट्रीय राजमार्ग की कुल लंबाई कितनी है?
*- 70,934 किमी*

7⃣देश में कुल सड़कों की लंबाई में राष्ट्रीय राजमार्ग का योगदान कितना है?
*- 1.7 प्रतिशद*

8⃣भारतीय संघ का राष्ट्रपति किसके परामर्श से कार्य करता है ?
*- प्रधानमंत्री*

9⃣गंधक के साथ रबड को गर्म करने की क्रिया क्या कहलाती है ?
*- वल्कनीकरण*

🔟पश्चिमी और पूर्वी घाट किन पहाड़ियों में मिलते हैं ?
*- नीलगिरि*

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1⃣सत्यशोधक समाज की स्थापना किसने की थी ?
*- महात्मा ज्योतिबा फूले*

2⃣टोडा जनजाति किस राज्य में निवास करती है ?
*- तमिलनाडु*

3⃣प्याज-लहसुन में गंध किस तत्व के कारण होती है ?
*- सल्फर*

4⃣संसार में सर्वाधिक दूध उत्पादन किस देश में होता है ?
*- भारत*

5⃣दक्षिण भारत का सर्वोच्च पर्वत शिखर कौनसा है ?
*- अनाईमुदी*

6⃣सरदार सरोवर परियोजना किस नदी पर बनाई गयी है ?
*- नर्मदा*

7⃣तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश के तट का क्या नाम है ?
*- कोरोमंडल तट*

8⃣नीली क्रांति का संबंध किस क्षेत्र से है ?
*- मत्स्य पालन*

9⃣भारत में सर्वाधिक मूंगफली का उत्पादन किस राज्य में होता है ?
*- गुजरात*


Tuesday, 24 October 2017

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Dosto jayada jankari ke liye aap hame comment main likh ker bataye aap ko kis terh ki post chahiye thank you

Govt. वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय 2010 Ki Photos

Aap apana photo pahchan sakte ho
Govt. वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय 2010
✌कुछ दोस्तों के नाम रवि डॉ मुकेश Ramesh Chahal..🖐❤💚💙💓💝🖤💜💛💝💕💟🧡🍓🍓🍍🍍🍒🍎🍇🍈🍊🍉🌽🥝🥒🍑🍌🍊🍉🍔🍟
Om datatrey g maharaj ji ki photo

Mahra haryana map

 चकौर नामक स्थल कहां पर स्थित है?– सोनीपत
स्काईलार्क नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– पानीपत
काला अम्ब नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– पानीपत
ब्लू जे नामक स्थल कहां पर स्थित
है?– समालखा पानीपत
ताजेवाला नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– यमुनानगर
हथनीकुंड नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– यमुनानगर
कलेसर नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– यमुनानगर
कोयल नामक स्थल कहां पर स्थित है?– कैथल
नीलकन्ति कृष्ण डेम नामक स्थल
कहां पर स्थित है?– कुरुक्षेत्र
रैड रोबिन नामक स्थल कहां पर स्थित
है?– भिवानी
डैरगों नामक स्थल कहां पर स्थित है?– दादरी
रेड बिशप नामक स्थल कहां पर स्थित है?– सिरसा तथा पंचकूला
दोनों जगहों पर है
बबलर जंगल नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– ( दारूहेडा )रेवाड़ी
सेन्डपाइपर नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– रेवाड़ी
सोहना झील (दमदमा) नामक स्थल कहां पर स्थित
है?– गुरुग्राम (गुडगाँव)
सुल्तानपुर पक्षी विहार नामक स्थल कहां पर स्थित
है?– गुरुग्राम (गुडगाँव)
गौड़ीय मठ नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– कुरुक्षेत्र
सूर्य कुंड नामक स्थल कहां पर स्थित
है?– बिलासपुर
सूरज कुंड नामक स्थल कहां पर स्थित
है?– फरीदाबाद
मेगपाई नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– फरीदाबाद
बड़खल झील नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– फरीदाबाद
अरावली गोल्फ प्ले ग्राउंड नामक स्थल
कहां पर स्थित है?– फरीदाबाद
डबचिक (इसे होडल के नाम से भी जाना जाता है)
नामक स्थल कहां पर स्थित है?– फरीदाबाद× (जिला
पलवल)√√
सफीदों नामक स्थल कहां पर स्थित है?–
जींद
हरियल नामक स्थल कहां पर स्थित है?– जींद
बुलबुल नामक स्थल कहां पर स्थित है?– जींद
अस्थल बोहर नामक स्थल कहां पर स्थित है?– रोहतक
कुबेर तीर्थ नामक स्थल कहां पर स्थित है?–
कुरुक्षेत्र
पीपली (परकित) नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– कुरुक्षेत्र
ज्योतिसर सरोवर नामक स्थल कहां पर स्थित है?– कुरुक्षेत्र
रामराय नामक स्थल कहां पर स्थित है?– जींद
ब्लू बार्ड नामक स्थल कहां पर स्थित है?– हिसार
कर्ण झील नामक स्थल कहां पर स्थित है?–
करनाल
उच्छना नामक स्थल कहां पर स्थित है?– करनाल
किंगफिशर नामक स्थल कहां पर स्थित है?– अम्बाला
यादवेंद्र गार्डन नामक स्थल कहां पर स्थित है?– पिंजौर
मोरनी हिल्स नामक स्थल कहां पर स्थित है?–
मोरनी नमक स्थान पर अम्बाला में
श्री महाकालेश्वर मंदिर या मठ नामक स्थल कहां पर
स्थित है?– कलेसर के पास
मुगल गार्डन नामक स्थल कहां पर स्थित है?– पिंजौर

PM Narender Modi ji ki Jeevani

Narendra Modi biography in hindi 2014 का चुनाव का परिणाम कुछ इस तरह रहा, जिसने जनता  की पॉवर को सबके सामने ला खड़ा किया. बच्चा – बच्चा नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर देखने को आतुर था. जिस कारण से भारी बहुमत के साथ नरेन्द्र मोदी ने जीत हासिल की और 30 सालों के रिकॉर्ड को तोडा. भारत मे 2014 का चुनाव का रिजल्ट परिवार वाद को ख़त्म करने का पहला पायदान रखा. 16 मई 2014 एक ऐतिहासिक दिन बन गया, इस दिन भारतीय एकता को हर दुश्मन ने करीब से देखा.



श्री नरेन्द्र मोदी  गुजरात की सफल राजनीति के प्रतीक हैं, इनका यह अनुभव ही सभी भारतियों के लिए एक नवीन युग का आधार हैं. प्रशासनिक प्रतिभा व द्रण संकल्प के साथ एक मजबूत हस्ती के रूप में सामने आये. श्री नरेंद्र मोदी का नाम पहले गुजरात की राजनीती व अब सम्पूर्ण भारत की राजनीती में सुनहरे अक्षर में लिखा है. एक चाय का स्टाल चलाने वाले साधारण से इन्सान का प्रधानमंत्री बनने का सफ़र काफी उतार चढ़ाव से भरा रहा. 10 सालों तक लगातार गुजरात में राज्य करने के बाद भारत देश के प्रधानमंत्री बने मोदी जी स्वाभाव से बहुत साधारण व मजबूत इरादे वाले इन्सान है. अभी देश के कालेधन की रोके के लिए प्रधानमोदी जी ने  बंद किये 500 और 1000 रूपए के नोट.

नरेन्द्र मोदी का जीवन परिचय (Narendra Modi biography in hindi)
क्रमांक जीवन परिचय बिंदु नरेंद्र मोदी जीवन परिचय
1.       पूरा नाम नरेंद्र दामोदरदास मोदी
2.       धर्म हिन्दू (गुजराती)
3.       जन्म 17 सितम्बर 1950
4.       जन्म स्थान वादनगर, गुजरात
5.       माता-पिता हीराबेन मोदी, दामोदरदास मूलचंद
6.       विवाह जशोदाबेन मोदी (1968)
7.       राजनैतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी
नरेन्द्र मोदी  का जन्म 17 सितम्बर 1950 में वदनगर मेहसाणा डिस्ट्रिक्ट में हुआ. नरेन्द्र मोदी के पिता का नाम दामोदर दास मूलचंद एवम माता का नाम हीरा बेन हैं. नरेन्द्र मोदी  के पिता बहुत साधारण तेलीय जाति के व्यक्ति थे, जिनके 6 संताने थी जिनमें से एक नरेन्द्र मोदी  था. नरेन्द्र मोदी अपने पिता के साथ  रेलवे स्टेशन पर चाय का स्टाल लगाते थे. इनकी पढाई में बहुत रूचि नहीं थी, पर इनके शिक्षक के अनुसार वे कुशल वक्ता थे.वाद-विवाद में नरेंद्र मोदी को कोई पकड़ नहीं सकता था. मोदी जी ने वडनगर से स्कूल की पढाई पूरी की, व् राजनीती विज्ञान में ग्रेजुएशन किया. बचपन से ही मोदी जी को देश के प्रति प्रेम था, उन्होंने 8 साल की उम्र में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में अपना पंजीकरण करा लिया था, ये एक शक्तिशाली हिन्दू राष्ट्रवादी समूह है, जो भारत के संविधान की बातों के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता नहीं चाहता था, वो समस्त देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता था. हिंदुत्व की ये बात बीजेपी की जड़ है.



1967 में 13 साल की उम्र में ही नरेन्द्र मोदी का जसोबेन नामक कन्या से विवाह करा दिया गया. 18 की उम्र  में जसोबेन का गौना कर उन्हें घर लाया गया, लेकिन छोटे नरेन्द्र मोदी  को विवाह में कभी रूचि नहीं थी, इस कारण उन्होंने घर छोड़ दिया. नरेन्द्र मोदी  हिमालय पर जा कर रहे और वहां से उन्होंने नयी जिन्दगी की तरफ रुख किया. घर छोड़ने के बाद नरेन्द्र मोदी  कभी पीछे नहीं मुड़े, इसलिए उन्होंने जसोबेन के उनके विवाह का सच कभी सामने नहीं रखा, क्यूंकि स्वाभाविक तौर पर उनका अपनी पत्नी से कोई नाता नहीं था. लेकिन हडकम जब मचा जब 2014 के नामांकन पत्र के दौरान नरेन्द्र मोदी ने खुद को विवाहित बताया.  जिसे विपक्ष ने काफी हवा देने कि कोशिश की लेकिन नरेन्द्र मोदी  जैसे देशभक्त को जनता  ने पहचान लिया था.

नरेन्द्र मोदी जी का राजनैतिक सफ़र –

खैर, घर छोड़ने के बाद नरेन्द्र मोदी  ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP) किया, यहाँ वे पुरे समय आयोजक के रूप में कार्य करने लगे. देश की विकट परिस्तिथि में मोदी जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. जैसे 1974 में भ्रष्टाचार विरोधी व 1975-77 में जब इंदिरा गाँधी की सरकार ने आपातकाल की घोषणा की थी. 1970-75 के बीच कई दिग्गज नेताओ ने वर्तमान सरकार का विरोध किया. जिनमे से एक थे जय प्रकाश नारायण. जिनके सानिध्य में नरेन्द्र मोदी  ने भी इस विरोध का साथ दिया. यहीं से श्री नरेन्द्र मोदी  के राजनैतिक जीवन की शुरुवात हुई, व उनके जीवन का आधार बना.





1985 में नरेन्द्र मोदी  को RSS द्वारा भारतीय जनता पार्टी (BJP) में दाखिल कराया गया. 1988 में नरेन्द्र मोदी  गुजरात के आयोजन सचिव बनाये गये. नरेन्द्र मोदी  जी के योगदान से 1995 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को गुजरात चुनाव में काफी सहयोग मिला. जिस कारण 1995 में नरेन्द्र मोदी  को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया और यहाँ से श्री नरेन्द्र मोदी ने नई दिल्ली की तरफ रुख  किया, युवा नेता को इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी