Friday, 27 October 2017

Mata tara rani ki Aage ki katha

देवताओं ने उस छिपकली के लिए प्रार्थना की कि उसे सब योनियों में उत्‍तम मनुष्‍य जन्‍म प्राप्‍त हो तथा अन्‍त में वह मोक्ष को प्राप्‍त करे।

तीसरे जन्‍म में वह छिपकली राजा स्‍पर्श के घर कन्‍या के रूप में जन्‍मी। दूसरी बहन तारा देवी ने फिर मनुष्‍य जन्‍म लेकर तारामती नाम से अयोध्‍या के प्रतापी राजा हरिश्‍चन्‍द्र के साथ विवाह किया।




राजा स्‍पर्श ने ज्‍योतिषियों से कन्‍या की कुण्‍डली बनवाई ज्‍योतिषियों ने राजा को बताया कि कन्‍या आपके लिये हानिकारक सिद्ध होगी, शकुन ठीक नहीं है। अत: वे उसे मरवा दें। राजा बोले कि लड़की को मारने का पाप बहुत बड़ा है। वे उस पाप का भागी नहीं बन सकते।

तब ज्‍योतिषियों ने विचार करके राय दी कि राजा उसे एक लकड़ी के सन्‍दूक में बन्द करके ऊपर से सोना-चांदी आदि जड़वा दें और फिर उस सन्‍दूक के भीतर लड़की को बन्‍द करके नदी में प्रवाहित करवा दें। सोने चांदी से जड़ा हुआ सन्‍दूक अवश्‍य ही कोई लालच में आकर निकाल लेगा और राजा को कन्या वध का पाप भी नहीं लगेगा। ऐसा ही किया गया और नदी में बहता हुआ सन्‍दूक काशी के समीप एक भंगी को दिखाई दिया तो वह सन्‍दूक को नदी से बाहर निकाल लाया।

उसने जब सन्‍दूक खोला तो सोने-चांदी के अतिरिक्‍त अत्‍यन्‍त रूपवान कन्‍या दिखाई दी। उस भंगी के कोई संतान नहीं थी। उसने अपनी पत्‍नी को वह कन्‍या लाकर दी तो पत्‍नी की प्रसन्‍नता का ठिकाना न रहा। उसने अपनी संतान के समान ही बच्‍ची को छाती से लगा लिया। भगवती की कृपा से उसके स्‍तनो में दूध उतर आया, पति-पत्‍नी दोनो ने प्रेम से कन्‍या का नाम रूक्‍को रख दिया। रूक्‍को बड़ी हुई तो उसका विवाह हुआ। रूक्‍को की सास महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र के घर सफाई आदि का काम करने जाया करती थी। एक दिन वह बीमार पड़ गई तो तो रूक्‍को महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र के घर काम करने के लिये पहुँच गई। महाराज की पत्‍नी तारामती ने जब रूक्‍को को देखा तो वह अपने पूर्व जन्‍म के पुण्‍य से उसे पहचान गई। तारामती ने रूक्‍को से कहा की वो उसके पास आकर बैठे। महारानी की बात सुनकर रूक्‍को बोली कि वो एक नीचि जाति की भंगिन है, भला वह रानी के पास कैसे बैठ सकती थी ?

तब तारामती ने उसे बताया कि वह उसके पूर्व जन्‍म के सगी बहन थी। एकादशी का व्रत खंडित करने के कारण उसे छिपकली की योनि में जाना पड़ा जो होना था। जो होना था वो तो हो चुका। अ‍ब उसे अपने वर्तमान जन्म को सुधारने का उपाय करना चाहिये और भगवती वैष्‍णों माता की सेवा करके अपना जन्‍म सफल बनाना चाहिये। यह सुनकर रूक्‍को को बड़ी प्रसन्‍नता हुई और जब उसने उपाय पूछा तो रानी ने बताया कि वैष्‍णों माता सब मनोरथों को पूरा करने वाली हैं। जो लोग श्रद्धापूर्वक माता का पूजन व जागरण करते हैं, उनकी सब मनोकाना पूर्ण होती हैं।

रूक्‍को ने प्रसन्‍न होकर माता की मनौती मानते हुये कहा कि यदि माता की कृपा से उसे एक पुत्र प्राप्‍त हो गया तो वो माता का पूजन व जागरण करायेगी। माता ने प्रार्थना को स्‍वीकार कर लिया। फलस्‍वरूप दसवें महीने उसके गर्भ से एक अत्‍यन्‍त सुन्‍दर बालक ने जन्‍म लिया; परन्‍तु दुर्भाग्‍यवश रूक्‍को को माता का पूजन-जागरण कराने का ध्‍यान न रहा। जब वह बालक पांच वर्ष का हुआ तो एक दिन उसे माता (-चेचक) निकल आई। रूक्‍को दु:खी होकर अपने पूर्वजन्‍म की बहन तारामती के पास आई और बच्‍चे की बीमारी का सब वृतान्‍त कह सुनाया। तब तारामती ने पूछा कि उससे माता के पूजन में कोई भूल तो नहीं हुई । इस पर रूक्‍को को छह वर्ष पहले की बात याद आ गई। उसने अपराध स्‍वीकार कर लिया। उसने फिर मन में निश्‍चय किया कि बच्‍चे को आराम आने पर जागरण अवश्‍य करवायेगी।

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