Good morning dosto Alewa village ki ek maine website banayi hai usame aap alewa gaow ki jankari ke sath sath vedik manters or Gk bhi pad sakte ho open karne ke liye www.alewajind.blogspot.com ye aap sedhe google search main likh ker pad sakte h best of luckभगवान श्रीराम भवसागर पार करानेवाले खेवनहार !
‘कैकयीको दिया वचन पूरा करने हेतु प्रभु श्रीरामचंद्र अपने भाई लक्ष्मण तथा पत्नी सीताके साथ वनवास जानेको निकले । प्रभु श्रीराम वनवासके मार्गपर गंगा नदीके सम्मुख आए । साक्षात प्रभु श्रीराम आए हैं, यह ज्ञात होते ही गुहक खेवैयाको बडा आनंद हुआ । वह दौडकर उनके पास आया तथा उन्हें साष्टांग प्रणाम कर कहा,“प्रभु, आपके दर्शनसे मैं धन्य हो गया ! मैं आपकी क्या सेवा करूं ?”
प्रभु श्रीराम बोले,“गुहक, तुमसे दूसरी किसी प्रकारकी सेवाकी हमारी अपेक्षा नहीं । अपनी नावसे केवल हमें गंगाके उसपार पहुंचा दो ।’’ अत: गुहकने उन तीनोंको गंगाके उसपार पहुंचा दिया । वहां पहुंचनेपर उनमें आगे दिया संभाषण हुआ ।
राम : गुहक, नावसे हमें गंगा नदीके इसपार पहुंचानेके पुरस्कार स्वरूप मैं तुम्हें क्या
दूं ?
गुहक : प्रभु, एक नाई दूसरे नाईके केश काटता है, तो क्या वह उससे कुछ लेता है ?
श्रीराम : नहीं ।
गुहक : प्रभु, एक वैद दूसरे वैदको दवाई देता है, तो क्या उससे दवाईके बदलेमें कुछ लेता है ?
श्रीराम : नहीं ।
गुहक : तो उसी प्रकार मैं तथा आप दोनों ही खेवनहार हैं; मैं आपसे क्या तथा कैसा पुरस्कार लूं ?
(गुहकके इस वक्तव्यसे श्रीरामको आश्चर्य हुआ । )
श्रीराम : गुहक, तुम खेवनहार हो, यह बात तो सही है; किंतु तुमने मुझे भी खेवनहार कैसे बना दिया ?
गुहक : प्रभु, मैं लागोंको नदीके उसपार पहुंचाता हूं; किंतु आप इच्छुक यात्रियोंको भवसागरके, अर्थात संसाररूपी सागरके उसपार पहुंचाते हैं । तो क्या आप मुझसे श्रेष्ठ खेवनहार नहीं ?
गुहकका यह तर्क सुनकर तथा उसका निरपेक्ष प्रेम देखकर प्रभु श्रीरामने उसे दृढ आलिंगन दिया । प्रभु श्रीरामका अलिंगन सुख अर्थात साक्षात जीवकी -शिवसे भेंट । गुहकको लगा जैसे उसका जीवन कृतार्थ हो गया हो । श्रीराम अवतार हैं, यह बात गुहककी समझमें आ गई । इस बातसे हमें पता चलता है कि उसका अध्यात्मिक स्तर कितना ऊंचा था । ’
‘कैकयीको दिया वचन पूरा करने हेतु प्रभु श्रीरामचंद्र अपने भाई लक्ष्मण तथा पत्नी सीताके साथ वनवास जानेको निकले । प्रभु श्रीराम वनवासके मार्गपर गंगा नदीके सम्मुख आए । साक्षात प्रभु श्रीराम आए हैं, यह ज्ञात होते ही गुहक खेवैयाको बडा आनंद हुआ । वह दौडकर उनके पास आया तथा उन्हें साष्टांग प्रणाम कर कहा,“प्रभु, आपके दर्शनसे मैं धन्य हो गया ! मैं आपकी क्या सेवा करूं ?”
प्रभु श्रीराम बोले,“गुहक, तुमसे दूसरी किसी प्रकारकी सेवाकी हमारी अपेक्षा नहीं । अपनी नावसे केवल हमें गंगाके उसपार पहुंचा दो ।’’ अत: गुहकने उन तीनोंको गंगाके उसपार पहुंचा दिया । वहां पहुंचनेपर उनमें आगे दिया संभाषण हुआ ।
राम : गुहक, नावसे हमें गंगा नदीके इसपार पहुंचानेके पुरस्कार स्वरूप मैं तुम्हें क्या
दूं ?
गुहक : प्रभु, एक नाई दूसरे नाईके केश काटता है, तो क्या वह उससे कुछ लेता है ?
श्रीराम : नहीं ।
गुहक : प्रभु, एक वैद दूसरे वैदको दवाई देता है, तो क्या उससे दवाईके बदलेमें कुछ लेता है ?
श्रीराम : नहीं ।
गुहक : तो उसी प्रकार मैं तथा आप दोनों ही खेवनहार हैं; मैं आपसे क्या तथा कैसा पुरस्कार लूं ?
(गुहकके इस वक्तव्यसे श्रीरामको आश्चर्य हुआ । )
श्रीराम : गुहक, तुम खेवनहार हो, यह बात तो सही है; किंतु तुमने मुझे भी खेवनहार कैसे बना दिया ?
गुहक : प्रभु, मैं लागोंको नदीके उसपार पहुंचाता हूं; किंतु आप इच्छुक यात्रियोंको भवसागरके, अर्थात संसाररूपी सागरके उसपार पहुंचाते हैं । तो क्या आप मुझसे श्रेष्ठ खेवनहार नहीं ?
गुहकका यह तर्क सुनकर तथा उसका निरपेक्ष प्रेम देखकर प्रभु श्रीरामने उसे दृढ आलिंगन दिया । प्रभु श्रीरामका अलिंगन सुख अर्थात साक्षात जीवकी -शिवसे भेंट । गुहकको लगा जैसे उसका जीवन कृतार्थ हो गया हो । श्रीराम अवतार हैं, यह बात गुहककी समझमें आ गई । इस बातसे हमें पता चलता है कि उसका अध्यात्मिक स्तर कितना ऊंचा था । ’


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